🎵 छन्द – परिभाषा, अंग, भेद और उदाहरण | Chhand in Hindi
✨ छन्द क्या है? (What is Chhand?)
Chhand In Hindi Grammar With 100+ Examples छन्द हिन्दी कविता का सौंदर्यात्मक ढांचा है, जो भाषा को लयबद्ध, मधुर और आकर्षक बनाता है। यह मात्राओं, वर्णों और गणों की विशिष्ट व्यवस्था पर आधारित होता है।
🔹 छंद शब्द ‘चद्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है — “आह्लादित करना”।
🔹 यदि किसी रचना में वर्णों या मात्राओं के नियमित विन्यास से आनंद उत्पन्न हो, तो वह छंद कहलाता है।
📚 छन्द की परिभाषा (Chhand Ki Paribhasha)
“वर्णों या मात्राओं की नियमित व्यवस्था जिससे कविता में लय और सौंदर्य उत्पन्न हो, उसे छन्द कहते हैं।”
🎯 छन्द कविता का व्याकरण है, जैसा कि गद्य का व्याकरण होता है।
- क्रिया विशेषण
- संबंधबोधक
- विस्मयादिबोधक
- समुच्चयबोधक
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📖 छन्द का इतिहास व महत्व
🪔 सबसे पहले ‘ऋग्वेद’ में छन्द का उल्लेख मिलता है।
📜 आचार्य पिंगल द्वारा रचित “छंदःशास्त्र” इस विषय का पहला प्रमुख ग्रंथ है, जिसे पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है।
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Join WhatsApp Channel💡 छन्द का अर्थ (Chhand Ka Arth)
🔹 संस्कृत साहित्य में छन्द का अर्थ होता है — लय या रचना में तालमेल।
🔹 कविता में लघु-गुरु मात्राओं और वर्णों की एक निश्चित प्रणाली के अनुसार रचना की जाती है।
🔸 जैसे — दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया, आर्या, गायत्री, आदि।
🪷 छन्द के प्रमुख उदाहरण (Chhand ke Udaharan)
📌 दोहा छंद
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार।
बरनौ रघुबर बिमल जस, जो दायक फल चार।।
📌 सोरठा छंद
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।
📌 चौपाई छंद
बदउऺ गुरु पद पदुम परागा, सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।
अमिय मूर्ति मय चूरन चारू, समन सकल भव रुज परिवारू।
📌 सवैया छंद
सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै।
नारद से सुक व्यास रहे, ताहि अहीर की छोरियाँ नचावै।।
🧩 छन्द के अंग (Chhand Ke Ang)
छंद के कुल 7 प्रमुख अंग होते हैं:
1️⃣ चरण / पद / पाद
2️⃣ वर्ण और मात्रा
3️⃣ संख्या और क्रम
4️⃣ गण
5️⃣ गति
6️⃣ यति / विराम
7️⃣ तुक (Rhyme)
📝 इन सभी तत्वों का पालन कर रचना को छंदबद्ध किया जाता है।
हिंदी व्याकरण अध्याय सूची:
भाषा, हिन्दी भाषा, वर्ण, शब्द, पद, काल, वाक्य, विराम चिन्ह, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण, विस्मयादि बोधक, संबंध बोधक, निपात , वचन, लिंग, कारक, उपसर्ग, प्रत्यय, संधि, छन्द, समास, अलंकार, रस, विलोम शब्द, तत्सम–तद्भव शब्द, पर्यायवाची शब्द, अनेक शब्दों के लिए एक शब्द, एकार्थक शब्द, शब्द युग्म, शुद्ध और अशुद्ध शब्द, मुहावरे, लोकोक्तियाँ, पद्य रचनाएँ, गद्य रचनाएँ, जीवन परिचय।
🔹 1. छंद में चरण / पद / पाद
छंद के सामान्यतः चार भाग होते हैं। प्रत्येक भाग को ‘चरण’, ‘पद’ या ‘पाद’ कहा जाता है।
👉 उदाहरण के लिए, दोहा, चौपाई, सोरठा आदि छंदों में 4 चरण होते हैं।
🔸 कई बार चरण चार होते हुए भी वे केवल दो पंक्तियों में लिखे जाते हैं — ऐसी पंक्तियों को ‘दल’ कहा जाता है।
🌀 विशेष छंद जैसे —
कुण्डलिया (दोहा + रोला)
छप्पय (रोला + उल्लाला)
— ये दो छंदों के योग से बने होते हैं और इनमें 6 पंक्तियाँ हो सकती हैं।
🎯 चरण के प्रकार:
समचरण – दूसरा और चौथा चरण
विषमचरण – पहला और तीसरा चरण
🔸 2. छंद में वर्ण और मात्रा
📌 वर्ण (Aksar/Varn):
वर्ण का अर्थ होता है — एक स्वर वाली ध्वनि, चाहे वह ह्रस्व हो या दीर्घ।
❌ जिन ध्वनियों में स्वर न हो (जैसे हलन्त – ‘न्’, संयुक्ताक्षर – ‘ष्’) उन्हें वर्ण नहीं माना जाता।
✅ वर्ण = अक्षर
📌 स्वर वर्ण दो प्रकार के होते हैं:
ह्रस्व स्वर – अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
📌 मात्रा (Maatra):
वर्ण की उच्चारण-अवधि को मात्रा कहते हैं।
ह्रस्व स्वर = 1 मात्रा
दीर्घ स्वर = 2 मात्राएँ
📌 लघु और गुरु:
लघु वर्ण (।) – एक मात्रा वाले
👉 जैसे: अ, इ, उ, ऋ, क, कि, कृगुरु वर्ण (ऽ) – दो मात्रा वाले
👉 जैसे: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, का, की, के, को आदि
🎯 विशेष:
चंद्रबिंदु वाले अक्षर जैसे हँसी, अँसुवर भी लघु माने जाते हैं।
अनुस्वार/विसर्ग युक्त जैसे “बिंदु, अतः” आदि गुरु माने जाते हैं।
संयुक्त वर्ण के पहले का अक्षर भी गुरु की श्रेणी में आता है।
🔹 3. छंद में संख्या और क्रम
📌 संख्या:
छंद में वर्णों या मात्राओं की कुल गिनती को संख्या कहते हैं।
📌 क्रम:
छंद में लघु और गुरु वर्णों के क्रम (क्रमशः व्यवस्थित स्थान) को क्रम कहते हैं।
📌 वर्णिक छंद:
सभी चरणों में वर्णों की संख्या और लघु-गुरु क्रम समान होता है।
📌 मात्रिक छंद:
चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है, पर लघु-गुरु का क्रम भिन्न हो सकता है।
🔸 4. गण (Gana) – केवल वर्णिक छंदों में
📌 गण का अर्थ है – तीन वर्णों का समूह।
🔹 गण में 3 वर्ण होते हैं और इन्हें लघु-गुरु के क्रम से पहचाना जाता है।
🔹 कुल 8 गण होते हैं:
🧠 याद करने का सूत्र:
“यमाताराजभानसलगा”
पहले 8 अक्षर गणों के सूचक हैं।
अंत के ‘ल’ = लघु, ‘ग’ = गुरु
🎯 गणों की सूची:
यगण: यमाता = । ऽ ऽ
मगण: मातारा = ऽ ऽ ऽ
तगण: ताराज = ऽ ऽ ।
रगण: राजभा = ऽ । ऽ
जगण: जभान = । ऽ ।
भगण: भानस = ऽ । ।
नगण: नसल = । । ।
सगण: सलगा = । । ऽ
🎯 उदाहरण:
यगण – भवानी
मगण – कैकेई
तगण – आभार
रगण – आरती
जगण – गणेश
नगण – कमल
भगण – आदर
सगण – चमचा
🔹 5. छंद में गति (Gati)
📌 गति का अर्थ है – काव्य-पाठ में प्रवाह या रचना की लय।
🔹 वर्णिक छंदों में गति स्वतः निर्धारित होती है क्योंकि लघु-गुरु निश्चित होते हैं।
🔹 मात्रिक छंदों में मात्राएँ समान होने के बावजूद गति प्रभावित हो सकती है।
🧠 उदाहरण:
“दिवस का अवसान था समीप” → अशुद्ध गति
“दिवस का अवसान समीप था” → सही गति
🎯 गति के कारण चौपाई, अरिल्ल, पद्धरि में अंतर होता है, जबकि सभी में 16 मात्राएँ होती हैं।
🔸 6. छंद में यति / विराम (Yati / Viram)
📌 यति वह स्थान होता है जहाँ पाठ करते समय साँस लेना या रुकना होता है।
🔸 छोटे छंदों में यति चरण के अंत में होती है।
🔸 बड़े छंदों में एक ही चरण में एक से अधिक यति हो सकते हैं।
🎯 उदाहरण:
मालिनी छंद में 15 वर्ण होते हैं –
👉 पहली यति 8वें वर्ण पर
👉 दूसरी यति 7वें वर्ण पर
🔹 7. छंद में तुक (Tuk)
📌 छंद के अंत में ध्वनि की समानता या तुकबंदी को ‘तुक’ कहते हैं।
🔹 जिसमें तुकबंदी हो → तुकांत छंद
🔹 जिसमें तुक न हो → अतुकांत छंद (Blank Verse)
✍️ तुक के दो भेद:
1️⃣ तुकांत कविता:
चरण के अंत में वर्णों की आवृत्ति (राइमिंग) होती है।
जैसे:
“हमको बहुत ई भाती हिंदी।
हमको बहुत है प्यारी हिंदी।”
2️⃣ अतुकांत कविता:
चरण अंत में वर्णों की समानता नहीं होती।
जैसे:
“काव्य सर्जक हूँ
प्रेरक तत्वों के अभाव में
लेखनी अटक गई हैं
काव्य-सृजन हेतु
तलाश रहा हूँ उपादान।”
🔹 7. छंद में तुक (Tuk)
📌 छंद के अंत में ध्वनि की समानता या तुकबंदी को ‘तुक’ कहते हैं।
🔹 जिसमें तुकबंदी हो → तुकांत छंद
🔹 जिसमें तुक न हो → अतुकांत छंद (Blank Verse)
✍️ तुक के दो भेद:
1️⃣ तुकांत कविता:
चरण के अंत में वर्णों की आवृत्ति (राइमिंग) होती है।
जैसे:
“हमको बहुत ई भाती हिंदी।
हमको बहुत है प्यारी हिंदी।”
2️⃣ अतुकांत कविता:
चरण अंत में वर्णों की समानता नहीं होती।
जैसे:
“काव्य सर्जक हूँ
प्रेरक तत्वों के अभाव में
लेखनी अटक गई हैं
काव्य-सृजन हेतु
तलाश रहा हूँ उपादान।”
🪷 छंद के भेद – Chhand Ke Bhed / Prakar
🔹 1. वर्णिक छंद (Varnik Chhand / Vrit)
📌 परिभाषा:
जिस छंद के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान होती है और लघु-गुरु का क्रम निश्चित होता है, उसे वर्णिक छंद कहा जाता है।
✍️ वर्णों की गिनती और क्रम दोनों पर आधारित होता है।
📌 उदाहरण:
प्रिय-पति वह मेरा प्राणप्यारा कहाँ है।
दुख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।
अब तक जिसको मैं देख के जी सकी हूँ।
वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है॥
📌 वर्णिक छंद के भेद:
साधारण वर्णिक छंद – चरणों में 26 वर्ण तक
दण्डक वर्णिक छंद – चरणों में 26 से अधिक वर्ण
📌 कुछ प्रमुख वर्णिक छंदों के नाम:
सवैया (22–26 वर्ण)
मालिनी (15 वर्ण)
शालिनी, स्वागता, भुजंगी, इन्द्रवज्रा, वंशस्थ (11–12 वर्ण)
वसंततिलका, पंचचामर, चंचला (14–16 वर्ण)
मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी (17 वर्ण)
शार्दूल विक्रीडित (19 वर्ण)
स्त्रग्धरा (21 वर्ण)
घनाक्षरी, कवित्त / मनहरण (31–33 वर्ण)
🔸 2. वर्णिक वृत्त छंद (Sam Chhand / Vrit Chhand)
📌 परिभाषा:
वर्णिक छंद का वह प्रकार जिसमें केवल वर्णों की गिनती नहीं, बल्कि लघु-गुरु के क्रम और गणविधान को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
🔹 इसे सम छंद भी कहते हैं।
🔹 इसमें चार चरण होते हैं और हर चरण में निश्चित लघु-गुरु अनुक्रम होता है।
📌 उदाहरण – मत्तगयन्द सवैया:
ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ।।
या लकुटी अरु कामरिया पर,
ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ
राज तिहुँ पुर को तजि डारौ।
✍️ इसमें 7 भगण (ऽ।।) और 2 गुरु (ऽ) होते हैं।
📌 अन्य उदाहरण:
द्रुतविलम्बित
मालिनी
🔹 3. मात्रिक छंद (Maatrik Chhand / Jati)
📌 परिभाषा:
जिस छंद में सभी चरणों में मात्राओं की संख्या समान होती है, पर लघु-गुरु के क्रम की बाध्यता नहीं होती, वह मात्रिक छंद कहलाता है।
✍️ मात्राओं की गिनती, गति, यति पर आधारित रचना।
📌 उदाहरण:
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भव रुज परिवारू॥
📌 मात्रिक छंद के 3 भेद:
1️⃣ सममात्रिक छंद – सभी चरणों की मात्राएँ समान
मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ, प्रभो! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।
2️⃣ अर्धमात्रिक छंद – पहले-तीसरे चरण समान, दूसरे-चौथे में भिन्न समानता
3️⃣ विषममात्रिक छंद – चारों चरणों में कोई दो चरण भी समान नहीं
📌 प्रमुख मात्रिक छंदों के नाम:
✅ सममात्रिक छंद:
अहीर – 11 मात्रा
तोमर – 12 मात्रा
चौपाई – 16 मात्रा
अरिल्ल, पद्धटिका, राधिका – 16–22 मात्रा
हरिगीतिका, तांटक, गीतिका, पीयूषवर्ष – 26–30 मात्रा
वीर / आल्हा – 31 मात्रा
✅ अर्धमात्रिक छंद:
बरवै – (12, 7)
दोहा – (13, 11)
सोरठा – (11, 13)
उल्लाला – (15, 13)
✅ विषममात्रिक छंद:
कुण्डलिया – (दोहा + रोला)
छप्पय – (रोला + उल्लाला)
🔸 4. मुक्त छंद (Mukt Chhand)
📌 परिभाषा:
जिस छंद में वर्ण या मात्रा की कोई निश्चित संख्या, क्रम या गणविधान न हो, उसे मुक्त छंद कहते हैं।
🔹 इसे मुक्तक छंद या रबर/केंचुआ छंद भी कहते हैं।
🔹 यह आधुनिक काव्य शैली की पहचान है।
📌 मुख्य विशेषताएँ:
कोई निर्धारित लय नहीं
कोई यति या तुकांत बंधन नहीं
भाव के अनुसार स्वतः बहाव
📌 उदाहरण – निराला की कविता ‘जूही की कली’ से:
वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को…
🪷 प्रमुख मात्रिक छंद – Pramukh Matrik Chhand
🟡 1. दोहा छंद (Doha Chhand)
➤ अर्धसममात्रिक छंद – 13-11-13-11 मात्राएँ।
➤ अंत में लघु (1) अनिवार्य होता है।
📌 उदाहरण:
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागैं अति दूर।।
🟢 2. सोरठा छंद (Soratha Chhand)
➤ 13-13 व 11-11 मात्राओं के उलट – 11-13-11-13 मात्राएँ।
➤ तुक पहले और तीसरे चरण में।
📌 उदाहरण:
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
🔵 3. रोला छंद (Rola Chhand)
➤ 24 मात्राएँ प्रति चरण (11 + 13)।
➤ अंत में 2 गुरु + 2 लघु वर्ण।
📌 उदाहरण:
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥
🔶 4. गीतिका छंद (Geetika Chhand)
➤ प्रत्येक चरण में 26 मात्राएँ – (14 + 12)।
➤ अंत में लघु + गुरु।
📌 उदाहरण:
हे प्रभो आनंददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए॥
🟣 5. हरिगीतिका छंद (Harigeetika Chhand)
➤ 28 मात्राएँ (16 + 12) प्रति चरण।
➤ अंत में लघु-गुरु विशेष रूप से।
📌 उदाहरण:
मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता।
मेरे तरु की तू कुसुमित, प्रिय कल्पना लतिका॥
🔺 6. उल्लाला छंद (Ullala Chhand)
➤ 28 मात्राएँ (15 + 13)।
📌 उदाहरण:
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण-मूर्ति सर्वेश की॥
🟥 7. चौपाई छंद (Chaupai Chhand)
➤ 16 मात्राएँ प्रति चरण।
➤ अंत में 2 गुरु या लघु आ सकते हैं।
📌 उदाहरण:
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
🟫 8. विषम छंद (Visham Chhand)
➤ 12-7-12-7 मात्राएँ।
📌 उदाहरण:
चम्पक हरवा अंग मिलि, अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हिलाय॥
🟩 9. छप्पय छंद (Chhappay Chhand)
➤ 6 चरणों वाला छंद –
पहले 4 चरण = रोला (24 मात्रा)
अंतिम 2 चरण = उल्लाला (26 या 28 मात्रा)
📌 उदाहरण:
नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
…
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की।
🟦 10. कुंडलियाँ छंद (Kundaliya Chhand)
➤ पहले 2 चरण = दोहा,
➤ अगले 4 चरण = उल्लाला,
➤ कुल = 6 चरण / 24-24 मात्राएँ।
📌 उदाहरण:
घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध।
बाहर का बक हंस है, हंस घरेलू गिद्ध॥
⚪ 11. दिगपाल छंद (Digpal Chhand)
➤ 24 मात्राएँ प्रति चरण (12 + 12)।
📌 उदाहरण:
हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती॥
🟠 12. आल्हा / वीर छंद (Aalha Chhand)
➤ 31 मात्राएँ (16 + 15)
➤ वीर रस की रचनाओं में प्रिय।
🔵 13. सार छंद (Saar Chhand)
➤ 28 मात्राएँ (16 + 12)
➤ अंत में 2 गुरु।
🟤 14. तांटक छंद (Tantak Chhand)
➤ 30 मात्राएँ (16 + 14)
➤ वीर रस में अधिक प्रयुक्त।
⚫ 15. रूपमाला छंद (Roopmala Chhand)
➤ 24 मात्राएँ (14 + 10)।
➤ अंत में गुरु लघु आवश्यक।
🟧 16. त्रिभंगी छंद (Tribhangi Chhand)
➤ 32 मात्राएँ (10 + 8 + 8 + 6)
➤ अंत में गुरु अनिवार्य।
📌 इसमें तीन यति बिंदु होते हैं – इसीलिए “त्रिभंगी”।
| 📌 छंद का नाम | 🧮 मात्राएँ | 📝 विशेषता |
|---|---|---|
| 📘दोहा | विषम: 13, सम: 11 (कुल 24) | अंत में लघु आवश्यक |
| 📘सोरठा | विषम: 11, सम: 13 | दोहा का उल्टा, तुकान्त प्रथम व तृतीय चरण |
| 📘चौपाई | हर चरण: 16 मात्रा | चार चरण, अंत में 2 गुरु |
| 📘रोला | हर चरण: 24 मात्रा | 13 मात्रा पर यति |
| 📘बरवै | विषम: 12, सम: 7 | अर्धमात्रिक |
| 📘हरिगीतिका | प्रत्येक चरण: 28 (16+12) | अंत में लघु+गुरु |
| 📘उल्लाला | विषम: 15, सम: 13 | अर्धमात्रिक |
| 📘कुण्डलिया | हर चरण: 24 मात्रा | पहले 2 दोहा, बाकी 4 रोला |
| 📘छप्पय | 4 रोला + 2 उल्लाला | 6 चरणों वाला मिश्रित छंद |
| 📘वीर / आल्हा | कुल 31 मात्रा (16+15) | वीर रस प्रधान, लोक शैली |
प्रमुख वर्णिक छंद : Pramukh Varnik Chhand
1. सवैया छंद
हर चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं।
एक वर्णिक गण का बार-बार प्रयोग।
उदाहरण:
लोरी सरासन संकट कौ, सुभ सीय स्वयंवर मोहि बरौ…
2. कवित्त / मनहरण / घनाक्षरी छंद
प्रत्येक चरण में 31-33 वर्ण होते हैं।
16वें और 17वें वर्ण पर विराम। अंत में तीन लघु। उदाहरण:
मेरे मन भावन के भावन के ऊधव के आवन की…
3. द्रुत विलम्बित छंद
12 वर्ण, एक नगण, दो भगण, एक सगण।
उदाहरण:
दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला…
4. मालिनी छंद
15 वर्ण, दो तगण, एक मगण, दो यगण।
उदाहरण:
प्रभुदित मथुरा के मानवों को बना के…
5. मंदाक्रांता छंद
17 वर्ण, भगण, नगण, दो तगण, दो गुरु।
उदाहरण:
कोई क्लांता पथिक ललना चेतना शून्य होके…
6. इन्द्रवज्रा छंद
11 वर्ण, दो जगण, अंत में दो गुरु।
उदाहरण:
माता यशोदा हरि को जगावै…
7. उपेन्द्रवज्रा छंद
11 वर्ण, नगण, तगण, जगण, दो गुरु। उदाहरण:
पखारते हैं पद पद्म कोई…
8. अरिल्ल छंद
16 मात्राएँ, अंत में लघु या यगण।
उदाहरण:
मन में विचार इस विधि आया…
9. लावनी छंद
22 मात्राएँ, अंत में गुरु। उदाहरण:
धरती के उर पर जली अनेक होली…
10. राधिका छंद
22 मात्राएँ, यति 13 और 9 पर। उदाहरण:
बैठी है वसन मलीन पहिन एक बाला…
11. त्रोटक छंद
12 मात्राएँ, 4 सगण। उदाहरण:
शशि से सखियाँ विनती करती…
12. भुजंगी छंद
11 वर्ण, तीन सगण, एक लघु, एक गुरु।
13. वियोगिनी छंद
सम चरण: 11 वर्ण, विषम: 10 वर्ण।
उदाहरण:
विधि ना कृपया प्रबोधिता…
14. वंशस्थ छंद
12 वर्ण, नगण, तगण, जगण, रगण।
उदाहरण:
गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी…
15. शिखरिणी छंद
17 वर्ण, यगण, मगण, नगण, सगण, भगण, लघु, गुरु।
16. शार्दूल विक्रीडित छंद
19 वर्ण, यति: 12 और 7 पर। मगण, सगण, जगण, तगण, गुरु।
17. मत्तगयंग छंद
23 वर्ण, सात सगण, दो गुरु।
छंद का महत्त्व:
छंद ह्रदय को बाँधने का कार्य करते हैं।
मानवीय भावनाओं को सुरम्य रूप में प्रकट करते हैं।
छंदों के कारण कविता में लय और गेयता आती है।
Chhand Par FAQs - छंद पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. Chhand kya hota hai? (छंद क्या होता है?)
Chhand kavya ki ek aisi ikai hai jisme varno ya matrao ki layabaddhata hoti hai. Ye kavita ko sangeet aur taal pradan karta hai jisse bhavnaon ka prasar asaan aur prabhavi hota hai.
2. Chhand ke prakar kaun-kaun se hote hain? (छंद के प्रकार कौन-कौन से होते हैं?)
Chhand ke mukhya prakar hain — Varnik Chhand, Matrik Chhand, Varnik Vrit Chhand aur Mukt Chhand. Inmein kai upprakar hote hain jo kavya ko alag-alag roop dete hain.
3. Varnik Chhand kya hai? (वर्णिक छंद क्या है?)
Varnik Chhand mein pratyek charan mein varno ki sankhya saman hoti hai. Ismein laghu-guru ki vyavastha hoti hai jo kavita ko swar aur lay pradan karti hai.
4. Matrik Chhand kya hota hai? (मात्रिक छंद क्या होता है?)
Matrik Chhand mein pratyek charan mein matrao ki sankhya saman hoti hai, lekin laghu-guru kram par zyada dhyan nahi diya jata. Ye matrao ke aadhaar par kavita ka sajawat hota hai.
5. Mukt Chhand kya hai? (मुक्त छंद क्या है?)
Mukt Chhand wo chhand hota hai jisme varno aur matrao ka koi bandhan nahi hota. Aaj ke adhunik kavya mein ye aazaadi aur prabhavi abhivyakti ke liye prachalit hai.
6. Pramukh Varnik Chhand kaun-kaun se hain? (प्रमुख वर्णिक छंद कौन-कौन से हैं?)
Savaiya, Kavitt, Drut Vilambit, Malini, Mandakranta, Indravajra, Upendravajra, Arill, Lavani, Radhika, Trotak, Bhujangi, Viyogini, Vanshasth, Shikharini, Shardul Vikridit, Mattagayang pramukh varnink chhand hain.
7. Pramukh Matrik Chhand kaun-kaun se hain? (प्रमुख मात्रिक छंद कौन-कौन से हैं?)
Doha, Chaupai, Soratha, Rola, Kundaliya, Barvai, Harigeetika, Ullala, Chhappay, Geetika, Alha ya Veer pramukh matrik chhand hain.
8. Doha Chhand ki visheshtayein kya hain? (दोहा छंद की विशेषताएं क्या हैं?)
Doha chhand ardhasammatrik hota hai jisme visham charan mein 13-13 matraayein aur sam charan mein 11-11 matraayein hoti hain. Ye Hindi aur Braj bhasha ki prasiddh kavya shaili hai.
9. Chhand ka sahitya mein kya mahatva hai? (छंद का साहित्य में क्या महत्व है?)
Chhand kavya ki lay aur taal ko niyamit karta hai, jisse kavita ka prabhav badhta hai. Ye manobhavon ko sangeetmay roop mein prastut karta hai aur pathakon ke hriday ko chhoo jata hai.
10. Kya Mukt Chhand adhunik kavita mein adhik prachalit hai? (क्या मुक्त छंद आधुनिक कविता में अधिक प्रचलित है?)
Haan, Mukt Chhand adhunik kavya lekhan mein zyada prachalit hai kyunki ismein kavi ko poori azaadi milti hai apni bhavnaon ko bina bandhan ke vyakt karne ki.
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