लोकोक्तियाँ lokoktiyan In Hindi

lokoktiyan In Hindi Grammar

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Alankar अलंकार का शाब्दिक अर्थ होता है ‘आभूषण’, जैसे स्त्री की शोभा आभूषण से बढ़ती है, वैसे ही काव्य की शोभा अलंकार से होती है।

❓ Frequently Asked Questions (FAQs) – Ras in Hindi
1️⃣ रस किसे कहते हैं?
रस का शाब्दिक अर्थ है ‘आनन्द’। काव्य को पढ़ने या सुनने से जो आनंद प्राप्त होता है, वही रस कहलाता है। रस को काव्य की आत्मा माना गया है।
2️⃣ रस की परिभाषा क्या है?
श्रव्य काव्य के पठन या श्रवण और दृश्य काव्य के दर्शन व श्रवण में जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, वह रस कहलाता है।
3️⃣ हिन्दी में मूल रस कितने हैं?
हिन्दी में मूल रूप से 9 रस माने गए हैं:
श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करुण, वीर, अद्भुत, वीभत्स, भयानक और शांत रस।
4️⃣ रस के कुल कितने भेद हैं?
रस के कुल 11 भेद माने जाते हैं:
श्रृंगार रस
हास्य रस
रौद्र रस
करुण रस
वीर रस
अद्भुत रस
वीभत्स रस
भयानक रस
शांत रस
वात्सल्य रस
भक्ति रस
भरतमुनि के अनुसार पहले 8 रस माने गए, फिर शांत, भक्ति और वात्सल्य रस जोड़े गए।
5️⃣ रसों की कुल संख्या कितनी है?
कुल रसों की संख्या 11 है। इनमें नौ मूल रसों के साथ वात्सल्य और भक्ति रस को भी जोड़ा गया है।
6️⃣ रस के उदाहरण लिखो?
📌 श्रृंगार रस:
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नहि जाय।
📌 हास्य रस:
बुरे समय को देख कर गंजे तू क्यों रोय।
किसी भी हालत में तेरा बाल न बाँका होय।
(अन्य रसों के उदाहरण ऊपर दिए गए मुख्य खंड में देखे जा सकते हैं।)
7️⃣ नौ रस क्या कहलाते हैं?
नौ रसों को नवरस कहा जाता है:
श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करुण, वीर, अद्भुत, वीभत्स, भयानक और शांत रस।
8️⃣ नवरस में कितने रस होते हैं?
नवरस का अर्थ होता है “नौ रस” – काव्य के वे नौ भाव जो काव्य को पूर्णता प्रदान करते हैं।
9️⃣ काव्य में रस की परिभाषा क्या है?
काव्य में रस वह आनंदमयी अनुभूति है, जो कविता, नाटक या गद्य के माध्यम से पाठक या श्रोता को होती है।
🔟 काव्य में रस की अवधारणा क्या है?
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में रस की व्यापक व्याख्या की है। यह माना गया कि ब्रह्मा ने देवताओं के मनोरंजन हेतु नाट्यवेद की रचना की और इसमें रसों की उत्पत्ति हुई।
नाट्यशास्त्र के छठे और सातवें अध्याय में रस और भावों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
नाट्यशास्त्र को पंचम वेद भी कहा गया है।
1️⃣1️⃣ काव्य में रस का क्या महत्व है?
काव्य में रस का स्थान मूल आत्मा के रूप में है।
उक्त वाक्य प्रसिद्ध है – “रसौ वै स:” अर्थात वह परमात्मा ही रस रूप है।
भरतमुनि ने कहा – “रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्” – रसयुक्त वाक्य ही काव्य होता है।
काव्य में भाव-सौन्दर्य, विचार, नाद और अप्रस्तुत योजना जैसे तत्त्वों में सबसे प्रमुख स्थान रस का होता है।

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पूर्वपद और उत्तरपद
समास में दो पद होते हैं –
• पहला पद: पूर्वपद
• दूसरा पद: उत्तरपद

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